The Khabar Xpress 13 अगस्त 2025। शहरी जीवन की तेज रफ्तार और बदलती जीवनशैली ने हमारे तीज त्योहारों को गुमनामी की ओर धकेल दिया है। सावन का महीना कभी महिलाओं के लिए उल्लास, आस्था और मेल-मिलाप का खास समय हुआ करता था। झूले, लोकगीत, मेंहदी और सोलह श्रृंगार से जुड़ी हरियाली तीज जैसे त्योहार इस मौसम की सबसे सुंदर पहचान थे तो भादवे के महीने में कजरी तीज को सुहागने हर्षोल्लास से मनाती है। यह त्यौहार पति की लंबी उम्र और वैवाहिक सुख के लिए मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। कजरी तीज, जिसे बड़ी तीज या सत्तू तीज के नाम से भी जाना जाता है, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, हरे रंग के कपड़े पहनती हैं और मेहंदी लगाती हैं। लेकिन अब हमारे ये तीज त्योहार धीरे-धीरे गुमनामी की ओर बढ़ रहे है। शहरी जीवन की तेज रफ्तार, बदलती जीवनशैली और परंपराओं के प्रति कम होती भावनात्मक जुड़ाव ने इस रंग-बिरंगे पर्व को फीका कर दिया है।
तीज माता के लिये भी नही है जगह
हमारे कस्बे के हालात तो ओर भी बदतर हो चुके है। आज कजरी तीज पर जब शहर की तीज माता की सवारी गलियों से निकलकर अपने गंतव्य स्थान पर पहुंची तो दिल बहुत आहत हुआ। जिस तीज माता की शाही सवारी गलियों से निकलती थी तो सुहागने पलक पावड़े बिछाए रखती थी। आज स्थिति ये थी कि ढोल नगाड़ों के साथ निकलने वाली तीज माता की सवारी में जहां शहर के गणमान्य नागरिक शामिल होते थे वहां अब ये 3-4 लोगो मे ही सिमट कर रह गयी है।

बताने वाले बताते है कि तीज माता की सवारी वाल्मीकि बस्ती के सामने मोमासर बास कच्चे जोहड़ तक जाती थी वहां पर धूमधाम से मेला भरा जाता था। लेकिन आज ये तीज अपने नियत स्थान से ही वंचित रह गई। आज तीज माता की सवारी को हाई स्कूल के सामने विराजने के लिए भी कोई व्यवस्था नही थी। एकबारगी तो तीज माता को वहां स्थित क्रिया खेजड़ी (जहां मृत्युपरांत क्रियायें करवाई जाती है) पर विराजित किया गया। फिर बाद में भूतनाथ मंदिर के सामने की चौकी पर विराजमान कर दिया गया।
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भूमाफियाओं एवं कब्जेधारियों के हत्थे चढ़ गया मेला स्थान
श्रीडूंगरगढ़ में तीज त्यौहार का मेला स्थान जो कभी इन मेलो से आबाद रहता था वहां अब भूमाफियाओं और कब्जाधारियों ने कब्जे कर लिए है और अपने घर भी बना लिए है। सबसे बड़ी बात ये है कि जानकारी में आया है कि जोहड़ पायतन के अंतर्गत आने वाली जमीन पर भी नगरपालिका द्वारा पट्टे बना दिये गए है। जबकि न्यायालय द्वारा स्पष्ट आदेश है कि जोहड़ पायतन और गोचर भुमि पर किसी भी तरह के कब्जे स्वीकार्य नही है। लेकिन श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका में कुछ भी असम्भव नही है। जो थोड़ी बहुत जगह बची है वो भी नगरपालिका की अकर्मण्यता की वजह से ऐसी हो रखी है कि आम आदमी पैदल निकले तब भी निकल ना पाए। वहाँ कचरे के ढेर लगे हुए है।
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सनातन संस्कृति को बचाने एवं हिन्दू होने का दम्भ भरने वाले संगठन और नेता भी कर रहे नजरअंदाज
ये भी अजीब विडंबना है कि क्षेत्र के अनेक तथाकथित हिंदूवादी संगठन एवं नेता है जो सनातन धर्म की पताका लिए खड़े रहते है जो यदा कदा जब अपना राजनैतिक मंच तलाशना हो तो वे उन जगहों पर तैयार मिलते है। लेकिन जब हमारे तीज त्यौहारों को सरंक्षण की बात आती है तो ये सभी मौन है। शहर में तीज त्योहारों के मेलो की जगह अब धर्मयात्रा एवं देवताओं के जन्मोत्सव पर होने वाले उत्सवो ने ले ली है। तीज त्योहारों के मेला स्थान पर सफाई ना होने पर इनकी चुपी रहती है तो इन स्थानों पर हो रहे अतिक्रमणों को भी ये नजरअंदाज कर देते है क्योंकि ना ही वहां कोई राजनैतिक मंच मिलता है और ना ही उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी होती है।








