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होली को हायर करके ले गए प्रवासी, बेरंग सी हो गयी है होली, जाने कहाँ गए वो दिन…

Published on: March 12, 2025

The Khabar Xpress 12 मार्च 2025। शायद अपनो की ही नजर लग गयी है हमारे त्योहारों को। जब भी कोई त्यौहार आता था तो दस दिन पहले से ही उसके आगमन का पूर्वाभास हमे इस वातावरण में मिल जाता था। अब ना तो वो दिन रहे ना वो त्यौहार।
कुछ समय पहले फाल्गुन मास के आरम्भ से ही इस छटा में रंग बिरंगी होली की बयार हवा में घुलमिल जाती थी। लेकिन आज ये होली बेरंग सी हो गयी है। आज की बेरंग होली से उमंग और उत्साह गायब है। शायद इसे ‘नए जमाने’ की नजर लग गई। ‘नए जमाने’ मतलब, नई सोच और नई जीवन शैली। जब जीवन शैली बदल जाती है, तो पर्व-त्योहारों के मानने और मनाने के भी तौर-तरीके बदल जाते हैं। हालांकि सिर्फ होली की बात नहीं है, बल्कि हर पर्व-त्योहार के साथ भी कमोबेश ऐसा ही हो रहा है।
एक समय था, जब किसी चौक चौराहे पर फागुन की महफिल सजती थी। उस महफिल में सभी तबके के लोग शामिल होते। वहां शरबत-पानी और रंग-गुलाल के साथ मुँह मीठा करने का भी इंतजाम होता था। ‘फाग’ गाने वाले सधी आवाज में गाते, फिर उनकी राग का साथ हर कोई मौजूद होली रसिया देता। चंग की थाप के साथ फागोत्सव की धमाल मचती। फाग के समवेत स्वर में लोगों की अलग-अलग भाव भंगिमाएं भी होतीं तो उनके अलग अलग रूप भी लोगो को रिझाते। अब तो सिर्फ कुछ कलाकारों को हायर करके अपना मनोरंजन भर कर लेते है।

लेकिन अब होली को शहरीपन और आधुनिकता की नजर लग गई है। अब पारंपरिक फाग जैसे कर्णप्रिय होली गीत सुनाई नहीं देते। अब इन पारंपरिक गीतों की जगह भौंडे और अश्लील गानों ने अपना स्थान बना लिया है। होली के महीने भर पहले से ही तिपहिया और बसों में होली के नाम पर ऊंची आवाज में अश्लील गाने बजने शुरू हो जाते हैं। इससे संभ्रांत महिलाओं के लिए कहीं आना-जाना भी मुश्किल हो जाता है।होली के दिन भी अलग-अलग टोलों में लोग ताश के पत्ते फेंटते दिखते हैं। पूरे गांव की होली पहले टोलियों में, फिर परिवार और अब पति-पत्नी और बच्चे तक सिमट कर रह गई है। रही सही कसर हमारे प्रवासियों ने पूरी कर दी। गांव की होली को प्रवासियों ने हायर कर लिया है। जो कुछ चंद फाग के कलाकार थे उन्होंने इसको पेशेवर रूप दे दिया और प्रवासियों द्वारा पूरे महीने ही इन फाग कलाकारों को इनकी कला की कीमत देकर अपने अपने क्षेत्रों में फाग महोत्सव का रूप देकर आयोजन करने लगे है। ये फाग के रसिया अब अपनी धरा को छोड़कर कर अन्य धरा पर होली के रंग बिखेर रहे है।

जाने कहाँ गए वो दिन

अब वे दिन नहीं रहे जब शरारती युवाओं की टोली जल्दी चिढ़ने वाले किसी बुजुर्ग को खोज कर उन्हें गहरे रंगों से सराबोर कर देती थी। उनके गुस्से को हंसी-ठहाकों में तब्दील नहीं करते। शहर ही नहीं, गांव का युवा वर्ग भी अब वाट्सऐप और यूट्यूब पर मशगूल है। बुजुर्ग अब बेकार की वस्तु बन गए। अब बात-बात पर लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। अब न पहले जैसी अल्हड़ मिजाजी रही और न पहले की तरह सहनशीलता। पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में भी पहले जैसी आत्मीयता नहीं रही।

ये सब अचानक हुआ हो ऐसा भी नहीं है। आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में हम इतने मगन हो गए कि हमे पता ही नहीं चला कि हम अपनी संस्कृति से कटते जा रहे हैं। हमारे सांस्कृतिक पर्व-त्योहारों में हर्ष के साथ शरीक होना अब कुलीनता को धूमिल करने लगा है। गाँव में होली जलाने की लकड़ी से लेकर गोबर के उपले तक इकठ्ठा करने की युवा टोली अब न जाने कहा गायब हैं। कही किसी गाँव में ज़िंदा भी हैं तो अब वैसी बात वहां भी नहीं। वरना बचपन में लकड़ी या उपला काम मिलने पर लोग अपने अपने घरो से उठाकर या यूं कहे साथियो से उड़ाकर ले जाते थे और होली सच में सबकी होती थी और उड़ते अबीर गुलाल के बीच वो कीचड का भी एक अलग आनंद था। काश वो बचपन की होली वापस आ जाती।
अब तो खलता हैं यूं होली से अपनों का दूर होना और अपनों में होली की वो मेल मिलाप की जगह अकेले की सेल्फी में बदलते देखना। अब होली में न तो भाईचारे और आपसी मेलजोल का राग रहा और न ही लोक-संस्कृति का रंग। एक समय होली का त्योहार आते ही चंग की थाप और मंजीरों पर चारों ओर फाग गीत गूंजने लगते थे और बसंती बयार के साथ फाग का राग घुल कर एक अलग ही माहौल बना देता था। ऐसा महसूस होता था जैसे पूरी सृष्टि नाच रही हो। लेकिन आधुनिकता ने इसे लील लिया। शहर की बात तो दूर, अब ग्रामीण परिवेश में भी फाग के राग के साथ चंग की थाप सुनाई नहीं पड़ती। सुनाई पड़ता है तो डीजे पर बजते फूहड़ता भरे गानो का कानफोड़ू कोलाहल।

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