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महाराणा प्रताप जयंती पर पढ़े वीर योद्धा की शौर्यगाथा, जाने क्यों दो बार मनाई जाती है महाराणा प्रताप जयंती..?

Published on: May 9, 2024

The Khabar Xpress 09 मई 2024। हर साल 9 मई को अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मेवाड़ के शूरवीर योद्धा और राजपूत आन-बान-शान के ध्वजावाहक महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जाती है। देश का बच्चा-बच्चा महाराणा प्रताप की वीरता और उनके शौर्य से अंजान नहीं है। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1940 को राजस्थान के कुंभलगढ़ में हुआ था।

इस 9 मई को शौर्य और साहस के प्रतीक महाराणा प्रताप की 485वीं जयंती मनाई जा रही है। भारत के इतिहास में जब भी शौर्य, पराक्रम, साहस और त्याग की बात होगी, उस वक्त महाराणा प्रताप की चर्चा ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। ऐसे शूरवीर की जयंती पर जानिए उनसे जुड़ा इतिहास।

तलवार लेकर अकेले खड़े थे वीर प्रताप

जब विदेशी मुगल आक्रांताओं का अत्याचार बढ़ चुका था। हर तरफ बस दमन और यातनाएं थी, उस वक्त तलवार लेकर खड़े होने वाले महाराणा प्रताप इकलौत राजपूत शासक थे। उन्होंने अपने मुट्ठी भर सैनिकों के दम पर हजारों शस्त्रधारी मुगलियां फौज को उलट पांव भागने पर मजबूर कर दिया था। महाराणा प्रताप के शौर्य गाथा सिर्फ भारत तक नहीं बल्कि दुनिया भर में पढ़ी और सराही जाती है।

अकबर की आंखों में खटकते थे महाराणा प्रताप

प्रताप के काल में दिल्ली में मुगल शासक अकबर का शासन था, जिस वक्त महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की गद्दी संभाली थी, उस वक्त राजपूताना (राजस्थान) बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रहा था। अकबर की क्रूरता के आगे कई राजपूत राजाओं ने सिर झुका लिए थे। लेकिन महाराणा प्रताप उन स्वाभिमानी राजघरानों में से थे, जिन्होंने कभी भी अकबर का झंडा नहीं उठाया, जिसके चलते अकबर की आंखों में शूरवीर प्रताप खटकते थे।

रणनीतिक गठबंधन: महाराणा प्रताप ने क्षेत्र में मुगल विस्तार का विरोध करने के लिए अन्य राजपूत शासकों और आदिवासी प्रमुखों को एक साथ मिलाया। उन्होंने आमेर के राजा मान सिंह और मारवाड़ के राव चंदा जैसे समान विचारधारा वाले शासकों के साथ गठबंधन बनाए रखा।

हल्दीघाटी का युद्ध: 1576 में हल्दीघाटी का युद्ध भारतीय इतिहास के सबसे प्रसिद्ध युद्धो में से एक है, जहां महाराणा प्रताप को अकबर के भरोसेमंद सेनापति राजा मान सिंह के नेतृत्व वाली मुगल सेना का सामना करना पड़ा। सैनिक बल और कम हथियार होने के बावजूद प्रताप की सेना ने दुश्मनों को खदेड़ा दिया।

गुरिल्ला युद्ध रणनीति: जब मुगल सेना की फिस से सामना हुआ, तो महाराणा प्रताप ने अरावली पहाड़ियों के ऊबड़-खाबड़ इलाके का उपयोग करते हुए गुरिल्ला युद्ध रणनीति अपनाई। उनकी गुरिल्ला रणनीति ने मुगलों को परेशान रखा और उन्हें अपना नियंत्रण मजबूत करने से रोका।

निर्वासन और संघर्ष: हल्दीघाटी में हार के बाद महाराणा प्रताप और उनके वफादार अनुयायी अरावली पर्वतमाला की पहाड़ियों और जंगलों में चले गए, जहां उन्होंने मुगलों के खिलाफ अपना प्रतिरोध जारी रखा। प्रताप ने वर्षों तक निर्वासन का जीवन बिताया, अनेक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।

चेतक – वफादार घोड़ा: चेतक, महाराणा प्रताप का प्रसिद्ध घोड़ा, अपनी वफादारी और वीरता के लिए प्रसिद्ध है। हल्दीघाटी के युद्ध के दौरान चेतक ने गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद प्रताप को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया और अपने जीवन की कीमत पर अपने मालिक की जान बचाई।

चित्तौड़ की विरासत: मेवाड़ साम्राज्य की ऐतिहासिक राजधानी चित्तौड़गढ़, महाराणा प्रताप की विरासत में एक विशेष स्थान रखती है। मुगलों से किला हारने के बावजूद उनका आत्मसमर्पण करने से इनकार करना और उसके बाद का संघर्ष अत्याचार के खिलाफ प्रतिरोध की अदम्य भावना का प्रतीक है।

धार्मिक सहिष्णुता: महाराणा प्रताप सभी धर्मों के प्रति सम्मान के लिए जाने जाते थे। उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता और सद्भाव की संस्कृति को बढ़ावा देते हुए अपने राज्य के भीतर सभी धर्मों के लोगों के लिए सुरक्षा और पूजा की स्वतंत्रता सुनिश्चित की।

मृत्यु और स्थायी विरासत: मुगल सेना के खिलाफ वर्षों के अथक संघर्ष के बाद 29 जनवरी, 1597 को महाराणा प्रताप ने अंतिम सांस ली। महाराणा प्रताप जयंती 2024 पर आइए हम उनके साहर और वीरता को याद करें और अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण के उनके गुणों को अपने जीवन में भी उतारने का प्रयास करें।

साल में दो बार क्यों मनाई जाती है प्रताप जयंती

साल में दो बार महाराणा प्रताप जयंती मनाई जाती है। बता दें कि हिन्दू पंचांग के अनुसार राणा प्रताप का जन्म ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ था। ऐसे में हर साल ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया को पूरे देश में महाराणा प्रताप जयंती हर्षोल्लास से मनाई जाती है। दूसरी तरफ अंग्रजी कैलेंडर के अनुसार प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ था। यहीं कारण है कि उनकी जयंती साल में दो बार मनाई जाती है।

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