The Khabar Xpress 12 अगस्त 2026, श्रीडूंगरगढ़। श्रीडूंगरगढ़ प्रशासन की आंखे बंद… भूमाफियाओं की चांदी। श्रीडूंगरगढ़ फिलहाल इसी पथ पर सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है। श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका की हजारों बीघा जमीन वैसे ही भूमाफियाओं के कब्जे में चली गयी है। अब इन भूमाफियाओं ने शिक्षा के मंदिर की जमीन को भी नहीं छोड़ा है।
10 सितम्बर 2018 को राजकीय महाविद्यालय श्रीडूंगरगढ़ को नगरपालिका द्वारा खसरा नम्बर 1067 और 1076 में से 15.43 बीघा भूमि अलॉट हुई थी, लेकिन आज मौके पर कॉलेज परिसर की जमीन कथित तौर पर दो-ढाई बीघा के आसपास ही दिखाई देती है। वर्तमान में जमीन के चारो तरफ भूमाफियाओं ने कब्ज़े कर लिए, अवैध निर्माण भी कर लिए गए साथ ही ज्ञात हुआ है कि इनके पट्टे भी नगरपालिका द्वारा ही बना दिये गए।
सबसे बड़ा घपला तो ये है कि शुरुआत में इस जमीन के पास किसी भी प्रकार के कब्जे नही थे। कॉलेज बनने के बाद ही चारो तरफ कब्ज़े होने शुरू हुए औऱ जानकारी मिली है कि पट्टा अभियान में ही इन भूमाफियाओं ने प्रशासन की सांठगांठ से पट्टे भी बना लिए। सवाल ये है कि जब ये जमीन कॉलेज को अलोटेड थी तब स्थानीय पालिका प्रशासन ने पट्टे बना कैसे दिए..? क्या पटवारी और किसी निरीक्षणकर्ता द्वारा ये नहीं देखा गया कि ये जमीन सरकारी कॉलेज की है…?


विडंबना यह है कि इतनी महत्वपूर्ण सरकारी जमीन होने के बावजूद महाविद्यालय परिसर की न तो पूरी चारदीवारी करवाई गई और न ही जमीन की सुरक्षा के लिए कोई समुचित मुख्य द्वार (गेट) बनाया गया। सवाल यह है कि जब सरकार अपने ही महाविद्यालय की जमीन को सुरक्षित नहीं रख पा रही, तो वर्षों से हो रहे कथित कब्जों और निर्माणों पर नजर कौन रखेगा ?
मुख्य द्वार के पास ही बन गए पक्के मकान
सबसे बड़ी बात है कि भूमाफियाओं ने महाविद्यालय के मुख्य द्वार को भी नहीं छोड़ा। मुख्य द्वार के अंदर ही कब्ज़ा करके पक्के मकान बना लिए गए है। पक्के मकानों का होना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।

कॉलेज की जमीन पर निर्माण कैसे हुआ ?
किसकी अनुमति से हुआ ?
किस रिकॉर्ड के आधार पर हुआ ?
और जब निर्माण हो रहा था, तब जिम्मेदार विभाग और प्रशासन कहाँ था ?
सूत्रों के अनुसार कुछ कब्जों के पट्टे भी जारी हो चुके है।
यदि वास्तव में सरकारी कॉलेज की भूमि से संबंधित पट्टे जारी हुए हैं, तो ये आम जनता के सामने आना चाहिए कि —
पट्टे किसके नाम जारी हुए ?
किस खसरा नंबर की जमीन पर जारी हुए ?
किस अधिकारी ने जारी किए ?
किस नियम और किस प्रक्रिया के तहत जारी किए गए ?
रिकॉर्ड खुला तो सामने आ सकता है पूरा सच
इस मामले में राजस्व रिकॉर्ड, पुरानी जमाबंदी, खसरा नक्शा, कॉलेज की भूमि का सीमांकन रिकॉर्ड और वर्तमान मौके की पैमाइश को आमने-सामने रख दिया जाए तो तस्वीर साफ हो सकती है।
सरकारी रिकॉर्ड में भूमि 15.43 बीघा है और मौके पर जमीन इससे काफी कम है, तो बाकी भूमि को पालिका व स्थानीय प्रशासन के साथ कॉलेज प्रशासन द्वारा अधिग्रहित करने की कार्यवाही आरम्भ कर देनी चाहिए।
यह भी जांच का विषय है कि जमीन पर कब्जे कब हुए और उस दौरान संबंधित विभागों ने क्या कार्रवाई की…?
हमे जानकारी मिली है कि इन भूमाफियाओं एवं अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ कॉलेज प्रशासन स्थानीय प्रशासन के पास भी गया था लेकिन इन भूमाफियाओं के दबाव के कारण किसी भी प्रकार की कार्यवाही को प्रशासन ने अंजाम नहीं दिया। वे आंखे बंद किये बैठे रहे।

किसके संरक्षण में पनपा यह खेल ?
सबसे गंभीर सवाल यही है—
ये महज अतिक्रमण नही है ये श्रीडूंगरगढ़ की सीधी साधी जनता के हितों पर प्रहार है। किन अधिकारियों एवं किन नेताओ के सरंक्षण में ये कब्ज़े का खेल पनपा और सींचा गया है ये भी आमजन के सामने आना चाहिए।
यदि इन भूमाफियाओं एवं अवैध अतिक्रमणकारियों के पास वैध दस्तावेज हैं तो उनकी वैधता की जांच होनी चाहिए।
यदि दस्तावेज अवैध हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए।
और यदि सरकारी भूमि पर बिना अधिकार कब्जा हुआ है तो कानूनी कार्यवाही कर सजा तय होनी चाहिए।
The Khabar Xpress का सवाल सीधा है—
राजकीय संपत्ति की हिफाजत की जिम्मेदारी आखिर किसकी है ?
15.43 बीघा जमीन में से बाकी जमीन कहाँ है?
किसके कब्जे में है ?
किसके नाम दर्ज है ?
और सरकारी जमीन की निगरानी करने वाले जिम्मेदार अधिकारी इतने वर्षों तक क्या करते रहे ?
अब जरूरत है निष्पक्ष सीमांकन, राजस्व रिकॉर्ड की जांच और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की।
क्योंकि यह सिर्फ एक कॉलेज की जमीन का सवाल नहीं है।
यह श्रीडूंगरगढ़ की सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल है।









