The Khabar Xpress 06 अगस्त 2026, श्रीडूंगरगढ़। आखिरकार करीब आठ घंटे के धरने ने वह कर दिखाया, जो वर्षों की शिकायतें, ज्ञापन और जनप्रतिनिधियों की मांगें नहीं कर सकीं। प्रशासन ने कहा—खराब पड़ी सोनोग्राफी मशीन ठीक होगी या बदली जाएगी, डॉक्टर लगाए जाएंगे और ट्रॉमा सेंटर बनने तक उपजिला अस्पताल में ही ट्रॉमा सेवाओं का संचालन होगा।
यह स्वागतयोग्य है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इन फैसलों के लिए जनता को धरने पर बैठना जरूरी था ?
- यदि मशीन बदली जा सकती थी, तो अब तक खराब क्यों पड़ी रही ?
- यदि डॉक्टर नियुक्त किए जा सकते थे, तो पहले क्यों नहीं किए गए ?
- यदि ट्रॉमा सेवाएं उपजिला अस्पताल में संचालित की जा सकती थीं, तो यह व्यवस्था घोषणा होने के बाद से ही क्यों नहीं बनाई गई ?
लगता है व्यवस्था का कैलेंडर जनता के दर्द से नहीं, आंदोलनों से चलता है। फाइलें तब खुलती हैं, जब सड़कें भरती हैं। निर्णय तब होते हैं, जब नारे गूंजते हैं। मानो प्रशासन का संदेश साफ हो—“पहले धरना दीजिए, फिर सुविधा लीजिए।”
स्वास्थ्य सेवाएं कोई राजनीतिक सौदेबाजी का विषय नहीं हैं। सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति यह नहीं पूछता कि फाइल किस टेबल पर अटकी है। उसे समय पर डॉक्टर चाहिए, मशीन चाहिए, इलाज चाहिए। क्योंकि दुर्घटना इंतजार नहीं करती और न ही मौत किसी सरकारी आदेश का इंतजार करती है।
जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि जिन व्यवस्थाओं की घोषणा आज की जा रही है, वे पहले क्यों नहीं थीं ?
क्या स्थानीय विधायक एवं प्रशासन को लोगों की पीड़ा दिखाई नहीं दे रही थी, या फिर उसे जगाने के लिए हर बार जनआक्रोश की घंटी बजानी पड़ेगी ?
The Khabar Xpress का स्पष्ट मत है कि यदि आंदोलन के बाद व्यवस्थाएं सुधर सकती हैं, तो इसका अर्थ यह भी है कि सुधार की क्षमता पहले से मौजूद थी। इसलिए भविष्य में केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। आखिर किसकी लापरवाही से स्वास्थ्य सुविधाएं वर्षों तक अधूरी रहीं ? इसका उत्तर भी जनता की ही तरह स्पष्ट होना चाहिए।
जनता ने अपना काम कर दिया—आवाज उठाई। अब बारी प्रशासन की है कि वह यह साबित करे कि यह सुधार केवल आंदोलन शांत कराने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने के लिए हैं।
क्योंकि लोकतंत्र में अधिकार मांगने नहीं पड़ते, सुनिश्चित किए जाते हैं। सवाल केवल ट्रॉमा सेंटर का नहीं है—सवाल यह है कि क्या जनता को अपने अधिकार पाने के लिए हर बार सड़क पर उतरना पड़ेगा ? यदि इसका उत्तर “हाँ” है, तो यह किसी एक विभाग की नहीं, पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता होगी। और यदि हर जनहित के काम के लिए जनता को सड़क पर उतरना पड़े, तो सवाल केवल व्यवस्था पर नहीं, उसकी संवेदनशीलता पर भी उठते हैं।









