The Khabar Xpress 06 अगस्त 2026, श्रीडूंगरगढ़। राजनीति में सबसे बड़ी भूल तब होती है, जब कोई संगठन यह मान ले कि चुनाव केवल बड़े चेहरों, प्रचार और सत्ता के दम पर जीते जा सकते हैं। इतिहास गवाह है कि चुनावी जीत की असली नींव वह कार्यकर्ता होता है, जो बिना किसी पद और स्वार्थ के वर्षों तक पार्टी का झंडा कंधे पर लेकर गांव-गांव और गली-गली घूमता है।
लेकिन यदि वही कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे, पुराने जनप्रतिनिधि स्वयं को संगठन से कटता हुआ देखें और वरिष्ठ नेताओं को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेला जाने लगे, तो यह किसी भी दल के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। कार्यकर्ताओ में हताशा तब होती है जब चुनाव के समय टिकट बंटवारे के बाद खुली ख़िलाफ़त करते है वे ही चुनावो के बाद मंचो पर अतिथि बने नजर आते है।
कल श्रीडूंगरगढ़ भाजपा के मुख्य संगठन माने जाने वाले विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल सहित जिले में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले पदाधिकारियों ने सामुहिक इस्तीफे देकर एक नई चर्चा को छेड़ दिया है। इनके इस्तीफों ने जहां राजनीति में रुचि रखने वाले आम आदमी को हैरत में डाल दिया वहीं राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
क्षेत्र में इन दिनों जो तस्वीर उभर रही है, वह कई सवाल खड़े करती है।
क्या अनुभव अब बोझ बन गया है ?
क्या वर्षों की निष्ठा का मूल्य समाप्त हो गया है ?
क्या संगठन में मतभेद रखने वाले हर व्यक्ति को विरोधी समझ लिया जाता है ?
यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक नहीं हैं, तो आत्ममंथन की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
किसी भी राजनीतिक दल का विस्तार केवल सत्ता से नहीं होता, बल्कि सम्मान और संवाद से होता है। जिस दिन कार्यकर्ता यह महसूस करने लगे कि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है, उसी दिन संगठन की जड़ें कमजोर पड़नी शुरू हो जाती हैं। नाराज कार्यकर्ता केवल एक व्यक्ति नहीं खोता, वह अपने साथ समाज का एक पूरा विश्वास भी लेकर चला जाता है।
यह भी याद रखना होगा कि चुनाव के समय मंच पर भीड़ जुटाने और मतदान के दिन घर-घर दस्तक देने का काम पोस्टर या सोशल मीडिया नहीं, बल्कि वही समर्पित कार्यकर्ता करता है, जो हर परिस्थिति में संगठन के साथ खड़ा रहता है। यदि उसे ही संदेह, उपेक्षा और दूरी का सामना करना पड़े, तो संगठन की सबसे बड़ी ताकत धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है।
आज आवश्यकता किसी को छोटा-बड़ा साबित करने की नहीं, बल्कि संगठन को बड़ा बनाने की है। पुराने और नए कार्यकर्ताओं के बीच संतुलन, वरिष्ठों के अनुभव का सम्मान और संवाद की संस्कृति ही किसी भी दल को लंबे समय तक मजबूत बनाए रख सकती है।
वरना वह दिन दूर नहीं होगा जब मंच तो सजे होंगे, झंडे भी छपेंगे, नारे भी लगेंगे, लेकिन उन्हें कंधे पर उठाकर चलने वाले समर्पित कार्यकर्ता कम पड़ जाएंगे।
राजनीति में विरोधी दल से पहले अपने कार्यकर्ता को खो देना सबसे बड़ी हार होती है। यदि समय रहते आत्ममंथन नहीं हुआ, तो यह चिंता कल की नहीं, आने वाले कई चुनावों की कहानी बन सकती है। जबकि निकाय चुनाव एवं पंचायत चुनाव बिल्कुल सामने है।









