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अमर शहीद हेमू कालाणी के बलिदान दिवस पर युवाओं ने किया याद

Published on: January 21, 2026

The Khabar Xpress 21 जनवरी 2026। श्रीडूंगरगढ़ के बिग्गाबास स्थित हेमू कालाणी पार्क में आज 21 जनवरी को शहीद दिवस मनाया गया। इस दौरान रवि रिझवानी, मुकेश संगवानी, विनोद रिझवानी सहित श्रीडूंगरगढ़ सिंधी समाज के गणमान्य लोगों ने अमर शहीद हेमू कालाणी को उनके बलिदान दिवस पर पुष्पांजलि देकर याद किया।

रवि रिझवानी ने अमर शहीद हेमू कालाणी के जीवन के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि भारत को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए जिन वीर सपूतों ने अपना बलिदान दिया, उनमें क्रांतिकारी अमर शहीद हेमू कालाणी भी थे, जो मात्र 19 वर्ष की उम्र में शहीद हो गये थे। हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च,1923 को सिंध के सक्खर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। और 19 वर्ष की उम्र में 21 जनवरी,1943 को शहीद हो गए थे। पेसूमल कालाणी एवं जेठी बाई के पुत्र हेमू बचपन से ही साहसी थे। स्कूल जाने के साथ ही वह क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए थे।

हेमू ने ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ नारे के साथ सिंधवासियों में जोश और स्वाभिमान भर दिया। वे विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार एवं स्वदेशी अपनाने का स्वावलंबन सूत्र भी देशवासियों को दे रहे थे। विदेशी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेकर वह स्वतंत्रता आंदोलन की सक्रिय गतिविधियों में शामिल हो गए। गोपनीय सूत्रों से सिंध के क्रांतिकारियों को जानकारी मिली कि बलूचिस्तान में चल रहे उग्र आंदोलन को कुचलने के लिए 23 अक्टूबर,1942 की रात अंग्रेज सैनिकों, हथियारों व बारूद से भरी रेलगाड़ी सिंध के रोहिणी स्टेशन से रवाना होकर सक्खर शहर से गुजरती हुई बलूचिस्तान के क्वेटा नगर जाएगी। यह समाचार सुनकर सक्खर के 19 वर्षीय छात्र हेमू कालाणी ने रेलगाड़ी को गिराने का दायित्व अपने ऊपर लिया,जिसमें उनके साथ दो सहयोगी नंद और किशन भी थे। रेलगाड़ी गुजरने से पहले ही तीनों नवयुवक एक सुनसान स्थल पर पहुंचे। हेमू कालाणी ने रिंच और हथौड़े की सहायता से रेल की पटरियों की फिशप्लेटों को उखाड़ना शुरू कर दिया। अन्य दो साथी निगरानी कर रहे थे। रात की निस्तब्धता में हथौड़ा चलाने की आवाजें दूर तक जा रही थीं। उसे सुनकर दूर गश्त कर रहे सिपाही दौड़कर आए। नंद और किशन तो वहां से भाग कर छिप गए,मगर हेमू कालाणी को उन्होंने पकड़ लिया। जेल में लाकर उन पर कोड़े बरसाए गए और उनसे दो सहयोगियों का नाम पूछा गया।

हेमू का हर बार यही उत्तर होता था, ‘मेरे दो साथी थे—रिंच और हथौड़ा।’ सक्खर की मार्शल ला कोर्ट ने देशद्रोह के अपराध में 19 वर्ष कुछ माह होने के कारण हेमू कालाणी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अनुमोदन के लिए निर्णय हैदराबाद (सिंध) स्थित सेना मुख्यालय के प्रमुख अधिकारी कर्नल रिचर्डसन के पास भेजा गया। ब्रिटिशराज का खतरनाक शत्रु करार देते हुए कर्नल रिचर्डसन ने हेमू कालाणी की सजा को फांसी में बदल दिया। 21 जनवरी, 1943 को प्रात: सात बजकर 55 मिनट पर हेमू कालाणी को फांसी पर लटकाया गया। हेमू ने ‘इंकलाब-जिंदाबाद’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हुए खुद अपने हाथों से फंदा गले में डाला,मानो फूलों की माला पहन रहे हों। मात्र 19 वर्ष की आयु में अमर शहीद हेमू कालाणी का प्राणोत्सर्ग सदैव याद रखा जाएगा। स्वतंत्रता के बाद संसद परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित हुई और भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया।

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