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अपनी बदहाली पर खून के आंसू बहाता श्रीडूंगरगढ़ का ताल मैदान, पढ़े विशेष रिपोर्ट

Published on: January 21, 2026

The Khabar Xpress 21 जनवरी 2026। श्रीडूंगरगढ़ का ताल मैदान वर्तमान स्थिति में अपनी बदहाली पर खून के आंसू रो रहा है। कभी ये मैदान गुलजार हुआ करता था। यहां पर कई धार्मिक आयोजनों के साथ विभिन्न राज्य, जिला व क्षेत्रीय स्तरीय प्रतियोगिताओ का आयोजन हुआ करता था। आज स्थिति ये है कि ये खेल मैदान अब जंगल का रूप ले रहा है तो शहर के बरसाती पानी को अपनी जमीन पर भी समेट रहा है। इस क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों एवं राजनेताओं ने इसके विकास के मुद्दे को अपना चुनावी मुद्दा तो हर बार बनाया लेकिन इसका विकास करने के बारे में कभी सोचा तक नहीं। इस नजरअंदाजी का परिणाम ये ताल मैदान भुगत रहा है।

22 अक्टूबर से 2 नवम्बर 1999 तक यानी 12 दिनों तक परम श्रद्धेय श्री रामसुखदासजी महाराज ने श्रीडूंगरगढ के ताल मैदान में सत्संग किया था। प्रति दिन 30 हजार लोगों की उपस्थिति इस ताल मैदान में रहा करती थी। इतनी भारी उपस्थिति वाला यह कार्यक्रम तभी संभव हुआ, जब सत्संग समिति, श्रीडूंगरगढ को यह ताल मैदान मिला। इसी तरह आगे भी कई बड़े कार्यक्रम हुए, जैसे क्षमारामजी महाराज का रामचरितमानस नवाह्नपारायण, रमेश भाई ओझा की हनुमत कथा, गोवत्स राधाकृष्ण जी महाराज की कथा, आचार्य तुलसी का मर्यादा महोत्सव तथा चातुर्मास, कितनी ही प्रकार की राज्य, जिला व क्षेत्रीय स्तरीय खेल प्रतियोगिताएं, पगला बाबा के कई बार के यज्ञ आयोजन, अनेक मेले आदि। इसके अलावा सामने स्थित हाई स्कूल के कार्यक्रम तो होते ही रहे हैं। आज से 10-15 साल पहले गणतंत्र दिवस एवं स्वतंत्रता दिवस के बड़े आयोजन इस ताल मैदान में होते थे लेकिन आज हालात इससे जुदा है। विभाग एवं प्रशासन ने तो जैसे इससे मुंह ही मोड़ रखा है।
वैसे तो यह ताल मैदान, हाई स्कूल का खेल मैदान है। यह हाई स्कूल की संपत्ति है। हाई स्कूल के वेतनभोगी प्राचार्य हमेशा अपनी इस सम्पत्ति से निस्पृह और उदासीन रहे हैं। उनको ये कभी भी फर्क नहीं पड़ता चाहे यह ताल कैसी भी स्थिति में हो। उन्हें क्या करना है, तनख्वाह टाइम टू टाइम मिलती रहे, बस। ऐसा और कहीं नहीं होता है। स्कूल के कुछ प्राचार्यों ने कभी कोशिश भी की तो विभाग, प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों का सहयोग कभी मिला नहीं।

राजनीतिक दल द्वारा हाई स्कूल के इस खेल मैदान का नामकरण श्यामाप्रसाद मुखर्जी स्टेडियम तो कर दिया गया लेकिन कभी भी उसके स्वरूप एवं उसके विकास की परिकल्पना भी नहीं की। हाई स्कूल के बेहोश प्राचार्यों ने भी ना इसका कभी विरोध किया। उनकी बला से इसका नाम कुछ भी करदो।
वरिष्ठ साहित्यकार व इतिहासकार डॉ चेतन स्वामी ने बताया कि इस ताल मैदान की दीवारें बहुत घटिया मैटेरियल से अनेक बार बनती-गिरती रही हैं। जैसे पिछली बरसात में बिना नींव डाले बनाई गई घटिया दीवार गिर गई। ये दीवारें कभी सांसद कोटे से तो कभी विधायक निधि या फिर नगरपालिका द्वारा बनती हैं और गिरती रही हैं।

आज तक जो भी विधायक या सांसद बने है उन्होंने इस ताल मैदान के जीर्णोद्धार एवं विकास को अपना मुद्दा बनाया है। अनेक बार घोषणाएं हुई हैं कि यहां कोई बढिया स्टेडियम बनाया जाएगा, पर श्रीडूंगरगढ में घोषणाओं पर ज्यादा गौर नहीं करना चाहिए।

बीकानेर के सांसद एवं देश मे बड़े राजनेताओं में से एक गिने जाने वाले केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को इस शहर एवं क्षेत्र की जनता ने अपने विश्वास के रूप में वोट तो खूब दिए लेकिन उन्होंने भी कभी इस खेल मैदान के विकास के बारे में सोचा तक नहीं।

झाड़ झंखाड़ गंदगी, कीचड़ का पर्याय बना यह ताल मैदान, इतना गंदा कभी नहीं रहा, जितना आजकल है। ऐसा लगता है, इस सुन्दर ताल मैदान की मौत हो गई है। ऐसा लगता है कि हमारे जनप्रतिनिधियों को इससे कोई सरोकार नहीं है। ताल मैदान की पूर्वी दिशा बाजार से बारिश के दिनों में कीचड़ की एक नदी आती है और ताल मैदान में आकर विश्राम पाती है। उस नदी के सामने की दीवार को तोड़ दिया गया। ये पूछने वाला कोई नही है कि “क्यूं तोड़ दिया गया..?”

श्रीडूंगरगढ़ के भूमाफिया सारी सरकारी भूमियां खा गए और निर्बाध खाते ही जा रहे हैं। एक यह ताल ही तो बचा है हमारे पास। बेहोश हाई स्कूल को तो अपनी इस धरोहर से कुछ लगाव नहीं है, पर इस नगर का शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति है, जिसके पांव कभी इस ताल पर पड़े नहीं ? अगर पड़े हैं तो अपनी चुप्पी के कारण आप और हम भी थोड़े से गुनहगार हैं।

मुझे पता है, मैं चाहे कितना भी लिख दू- आज भी आप हमेशा की भांति जरा भी उद्वेलित नहीं होओगे। यहाँ की जनता एवं जनप्रतिनिधि व समाजसेवी जहां भी हैं, अपने गूदड़ों में मस्त हैं। उनको श्रीडूंगरगढ़ के विकास की नहीं वरन अपने विकास की चिंता है।

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