The Khabar Xpress 15 सितंबर 2025। 14 सितंबर को “हिंदी दिवस” के अवसर पर सम्पूर्ण देश मे कई आयोजन हुए। श्रीडूंगरगढ़ के राष्ट्र भाषा हिंदी प्रसार समिति सभागार में साहित्यकारों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए स्थानीय विधायक ताराचंद सारस्वत ने कहा कि हिंदी एवं हमारी भारतीय संस्कृति दोनों अनुस्यूत है- एक दूसरे से जुड़ी हुई है, इसलिए संस्कृति को बचाने के लिए हिंदी को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। सारस्वत में इस बात पर भी बल दिया कि हमें हिंदी के साथ-साथ दैनन्दिनी जीवन में स्वदेशी अपनाना चाहिए।

हिंदी दिवस पर सम्मानित
राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति के अध्यक्ष श्याम महर्षि ने साहित्यिक सेवाओं का विवरण प्रस्तुत किया।
- साहित्य श्री सम्मान डॉ. पद्मजा शर्मा
- नंदलाल महर्षि स्मृति हिन्दी सर्जन पुरस्कार -देवेंद्र कुमार मिश्रा (जबलपुर)
- सुरेश कंचन ओझा लेखन पुरस्कार – कुमार सुरेश
- चंद्र मोहन हाड़ा हिमकर स्मृति पुरस्कार –उपन्यासकार विश्वनाथ तंवर
- रामकिशन उपाध्याय समाज सेवा पुरस्कार हरिशंकर बाहेती (राशि दुगुनी कर समिति को समर्पित की)
- -शिव प्रसाद सिखवाल महिला लेखन पुरस्कार -संगीता सेठी (बीकानेर)
- शब्द शिल्पी सम्मान – सुरेश कुमार श्रीचंदानी (अजमेर)
- श्याम सुंदर नगला बाल साहित्य पुरस्कार – डॉ. नागेश पांडेय (शाहजहांपुर)
हिंदी दिवस का इतिहास
14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। पहली बार 1953 में हिंदी दिवस मनाया गया था। 2011 की भाषायी जनगणना का आंकड़ा 2018 में जारी किया गया था। मीडिया में प्रकाशित इन आंकड़ों के मुताबिक 43.63 प्रतिशत आबादी की मातृभाषा हिंदी है। इसी तरह कुल 35 में से 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लोगों के बीच आपसी व्यवहार और रोजमर्रा के संचार की पहली भाषा हिंदी है लेकिन ये आंकड़ा भी गौरतलब है कि 2001 से 2011 के दरमियान 25 प्रतिशत की दर से हिंदी का विस्तार हुआ है और उक्त अवधि में इसे बोलने वाले करीब दस करोड़ लोग और जुड़े हैं। आज तो ये आंकड़ा और अधिक बढ़ चुका होगा। देश की 10 सबसे बड़ी भाषाओं में एक हिंदी ही है जिसके बोलने वालों के अनुपात में बढ़ोत्तरी देखी गई है। जिन राज्यों और क्षेत्रों में हिंदी बोली जाती है उनकी आबादी की दर भी गैर हिंदीभाषी क्षेत्रों की तुलना में तेजी से बढ़ी है, हिंदी बोलने वालों की संख्या में उछाल का बड़ा कारण तो यही है। 1971-2011 की अवधि में हिंदी 161 प्रतिशत की दर से बढ़ी तो चार सबसे बड़ी द्रविड़ भाषाएं इसी अवधि में लगभग आधा, 81 प्रतिशत की दर से ही बढ़ पाईं।
वर्चस्व खोती हिंदी
हिंदी, जो हमारे देश की आत्मा कही जाती है, आज धीरे-धीरे अपनी चमक खोती जा रही है। अब हिंदी अपना वर्चस्व खो रही है। कभी जो भाषा घर-घर में बोली जाती थी, अब वह आधुनिकता की दौड़ में कहीं पीछे छूटती नजर आ रही है। आज के समय में अंग्रेज़ी को ही बुद्धिमानी और तरक्की की निशानी माना जाने लगा है। स्कूल हो या दफ्तर, लोग हिंदी बोलने में संकोच महसूस करते हैं, जैसे यह भाषा पुरानी या पिछड़ी हुई हो। सोचने वाली बात यह है कि जो भाषा हमारे दिलों से जुड़ी है, वही हमारे अपने लोग क्यों भूलते जा रहे हैं ? क्या हिंदी में भावनाएं कम हैं? क्या यह ज्ञान देने में कमजोर है ? बिलकुल नहीं! हिंदी में वो ताकत है जो दिलों को जोड़ सकती है, विचारों को व्यक्त कर सकती है और एकता को मजबूत कर सकती है। लेकिन आज का युवा वर्ग, सोशल मीडिया और शिक्षा प्रणाली के प्रभाव में आकर हिंदी से दूर होता जा रहा है। हमें समझना होगा कि अपनी भाषा से दूरी, अपनी पहचान से दूरी है। यही सवाल उठता है क्या हम हिंदी को उसका असली स्थान फिर से दिला पाएंगे ?
प्रत्येक 14 सितंबर को सरकारी कार्यालय प्रायः हिंदी दिवस, सप्ताह, पखवाड़ा या मास का आयोजन करते हैं किंतु जितनी निष्ठा से हिंदी को अपनाने पर बल देना होना चाहिए वह नहीं करते।
हिंदी भाषा का महत्व कम होने का क्या है कारण ?
आज के समय में हिंदी भाषा का महत्व धीरे-धीरे इसलिए कम हो रहा है क्योंकि समाज में अंग्रेज़ी को एक ऊँचे दर्जे की भाषा माना जाने लगा है। लोग सोचते हैं कि अगर किसी को अंग्रेज़ी अच्छे से आती है, तो वह ज़्यादा पढ़ा-लिखा और समझदार है। यही सोच लोगों को हिंदी से दूर कर रही है। स्कूल और कॉलेज में बच्चों को शुरू से अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाया जाता है। यहाँ तक कि कई माता-पिता अपने बच्चों से हिंदी में बात करने से भी कतराते हैं। उन्हें लगता है कि इससे बच्चे पिछड़ जाएंगे।
इसके अलावा, सोशल मीडिया, टीवी, औरइंटरनेट पर भी अंग्रेज़ी का प्रभाव बहुत बढ़ गया है। युवा वर्ग विदेशी शब्दों और भाषा को “कूल” और “स्टाइलिश” मानता है। उन्हें लगता है कि हिंदी बोलने से वे पुराने ज़माने के लगेंगे। शिक्षा प्रणाली, समाज की सोच, और आधुनिक जीवनशैली ये सभी मिलकर हिंदी को पीछे ढकेल रहे हैं। जब तक हम इस सोच को नहीं बदलते, तब तक हिंदी को उसका सम्मान वापस दिलाना मुश्किल होगा।
भाषा पर राजनीति, राज्यों के झगड़े और आम लोगों की उलझन
हिंदी भाषा का महत्व सिर्फ शिक्षा या बोलचाल से नहीं घट रहा है, बल्कि इसके पीछे एक राजनीतिक खेल और क्षेत्रीय असमानता भी छिपी है। भारत जैसे विशाल और विविधताओं वाले देश में, जहाँ हर राज्य की अपनी भाषा और पहचान है, वहाँ हिंदी को लेकर एक संतुलन बनाना हमेशा चुनौती रहा है। कई दक्षिण भारतीय राज्यों, जैसे तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश में हिंदी को “थोपी गई भाषा” माना जाता है। वहाँ लोग अक्सर कहते हैं कि हिंदी को राजभाषा तो बना दिया गया, लेकिन यह राष्ट्रभाषा नहीं है और इसे सभी पर थोपा नहीं जाना चाहिए। इस सोच का असर यह हुआ कि हिंदी को स्वीकार करने के बजाय विरोध का रूप मिलने लगा। दूसरी ओर, उत्तर भारत के लोग, जहाँ हिंदी मुख्य भाषा है, ये महसूस करते हैं कि उनकी भाषा को अब भी वह सम्मान नहीं मिला जो एक राजभाषा को मिलना चाहिए। सरकारी नौकरियों, UPSC जैसी परीक्षाओं और उच्च शिक्षण संस्थानों में आज भी अंग्रेज़ी को ज़्यादा प्राथमिकता दी जाती है।
राजनीतिक पार्टियाँ भी भाषाओं को हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं। कहीं हिंदी को “राष्ट्र की एकता का प्रतीक” कहा जाता है, तो कहीं इसे “एक भाषा का जबरदस्ती थोपा जाना” बताया जाता है। यह दोगली नीति भाषा को एकजुट करने के बजाय और ज्यादा बांट देती है। इस सबके बीच आम जनता फँस जाती है। कोई हिंदी बोलने में शर्म करता है, कोई हिंदी सीखना ही नहीं चाहता, और कोई ये सोचता है कि भाषा से बड़ा पेट भरना है चाहे वो किसी भी भाषा में हो।
हिंदी का पतन कैसे और कब से ?
हिंदी का पतन कोई अचानक हुई घटना नहीं है। इसका आरंभ ब्रिटिश काल में हुआ, जब लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति (1835) के तहत अंग्रेज़ी को शिक्षा और प्रशासन की भाषा बना दिया गया। धीरे-धीरे हिंदी को कमजोर किया जाने लगा। आज़ादी के बाद उम्मीद थी कि हिंदी को प्राथमिकता दी जाएगी, लेकिन अंग्रेज़ी का वर्चस्व बरकरार रहा। फिर आया टीवी, सिनेमा और इंटरनेट का युग, जिसमें अंग्रेज़ी को “स्टाइल” और “स्मार्टनेस” का प्रतीक बना दिया गया। हिंदी अब भी जीवित है, लेकिन हर दिन अपनी जगह खो रही है हमारे बोलचाल, हमारी सोच और हमारे समाज में।
आज की पीढ़ी में हिंदी का स्थान
आज की युवा पीढ़ी दो हिस्सों में बँटी हुई है। एक हिस्सा वो है जो मानता है कि करियर में आगे बढ़ने के लिए अंग्रेज़ी ज़रूरी है, और हिंदी सिर्फ घर या स्कूल तक सीमित रह गई है। उन्हें लगता है कि हिंदी बोलना “देसी” या “गाँव वाला” बनने जैसा है। वहीं दूसरा हिस्सा ऐसे युवाओं का है जो अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं। वे हिंदी में वीडियो बना रहे हैं, लेख लिख रहे हैं, पॉडकास्ट चला रहे हैं और हजारों लोगों से जुड़ भी रहे हैं। आज सोशल मीडिया पर हिंदी कंटेंट तेजी से बढ़ रहा है। यह दिखाता है कि अगर भाषा को सही मंच मिले, तो युवा उसे अपनाने से हिचकिचाते नहीं।
जब हम खुद हिंदी को अपनाएँगे, तभी आने वाली पीढ़ी भी इससे जुड़ पाएगी। हिंदी को बचाना कोई आंदोलन नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है।
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मुलताई में कुछ बैंक, कुछ शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बिना पार्किंग के संचालित हो रहे हैं, तथा कुछ लोगों ने पार्किंग के लिए जगह बहुत कम दी है। जो वाहन पार्किंग के लिए पर्याप्त नहीं है। इससे ग्राहको को वाहन खड़े करने में बहुत परेशानी होती है। आखिर बिना पार्किंग के बैंक कैसे संचालित हो रहे हैं। ये तो नियमों का उल्लघंन हो रहा है। सड़क किनारे वाहन खड़े करने से यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है। कई बार दुर्घटना तक हो जाती है। सरकारी जमीन पर वाहन खड़े हो रहे हैं । जबकि जिस भवन मे बैंक संचालित होती है उसकी स्वयं की पार्किंग होना जरूरी है। मुलताई में संचालित सभी बैंकों की पार्किंग व्यवस्था की जांच होना चाहिए।
कुछ बेसमेंट बिना अनुमति के बने हैं। कुछ व्यावसायिक भवनों के नक्शे बिना पार्किंग दिए पास हुए हैं। कुछ लोगों ने सरकारी जमीन पर पक्का अतिक्रमण कर लिया है। जांच होना चाहिए।
रवि खवसे, मुलताई (मध्यप्रदेश)