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महिला दिवस विशेष- हर दिन होना चाहिए नारी के नाम क्योंकि वो बिना थके करती है सबके काम : विनीता सारस्वत

Published on: March 8, 2025

The Khabar Xpress 08 मार्च 2025। आज 8 मार्च को ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ दुनिया भर में मनाया गया है। यह दिन महिलाओं के अधिकारों, उनकी उपलब्धियों और समाज में उनके योगदान को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। पूरी दुनिया में यह दिन महिलाओं की समानता, सशक्तिकरण और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों, सेमिनारों और रैलियों के माध्यम से मनाया जाता है लेकिन हम जब अपने आसपास नजर डालते है तो ये सभी बातें अप्रासंगिक लगती है। जितनी किताबी बाते महिला उत्थान और प्रगति की जाती है उतने ही हाशिये पर महिलाओ की स्थिति बनी हुई है। समाज समानता की बात करता है लेकिन इस पुरुष प्रधान समाज मे क्या हमें समानता का अधिकार मिला हुआ है। हम ये नही कहते कि हम अपने संस्कार एवं संस्कृति को अपनी बेड़ियां मानते है लेकिन जहां हमे अधिकार देने चाहिए वहां तो हमे मौका मिलना चाहिये। आज जब हम राजनीतिक स्तर पर इसकी चर्चा करें तो हम सभी को इसके हजारों उदाहरण मिल जाएंगे कि हमे सिर्फ एक हस्ताक्षर के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता है जबकि नारी अगर पढ़ी लिखी हो तो वो काफी कुछ मदद कर सकती है लेकिन फिर भी उसे हाशिये पर ही रखा जाता है। श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका हो या पंचायत समिति वहां निर्वाचित महिलाओ की क्या स्थिति है ये किसी से छुपा हुआ नहीं है। किसी भी निर्णय का उन्हें अधिकार नहीं है। उनके घोषित प्रतिनिधि के रूप में पुरुष ही उनके निर्णय लेते है चाहे वो महिला शिक्षित हो या अशिक्षित।

वहीं जब बात परिवार या समाज पर आए तो हर महिला को ही उनके कर्तव्यों की याद दिलाई जाती है। सुबह उठने से लेकर परिवार के सोने तक की हर जिम्मेदारी बिना थके महिला ही देखती है तो कोई भी पारिवारिक संस्कार उनके बिना पूरे नहीं हो पाते। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ कहने वाले देश मे महिलाओ पर आए दिन होने वाले अत्याचारों एवं अमानवीय व्यवहार से सभी समाचारपत्र और न्यूज़ चैनल भरे रहते है। मेरा मानना है कि एक महिला जन्म से लेकर मृत्यु तक संघर्ष में ही जीवन यापन करती है। जन्म के बाद पुरुषवादी परिवार में अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष तो विवाहोपरांत अपने परिवार एवं समाज के लिए अपने दायित्वों का लिए संघर्ष। पूरा जीवन ही संघर्ष है। मेरा मानना है कि इस पुरुषप्रधान परिवेश में हर दिन नारी के नाम होना चाहिए क्योंकि वो बिना रुके, बिना थके ही सबका काम करती है।

विनीता सारस्वत
देहात जिलाध्यक्ष
विप्र फाउंडेशन बीकानेर

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