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क्या यही लोकतंत्र है…?, बदतर स्थिति में है श्रीडूंगरगढ़

Published on: July 16, 2024

The Khabar Xpress 16 जुलाई 2024। क्या यही लोकतंत्र है…?

हर व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से किसी न किसी राजनीतिक पार्टियों से प्रभावित रहता है। चाहे वो कोई समाजसेवी हो, व्यवसायी हो, नौकरीपेशा हो या फिर चाहे कोई पत्रकार ही हो। कहीं न कहीं किसी रूप में उसका झुकाव किसी राजनैतिक दल के साथ होता ही है। लेकिन मेरा मानना है कि पत्रकार अगर अपने राजनैतिक प्रभाव को कुछ हद तक भी तटस्थ रखकर अपनी लेखनी चलाये तो वो जनता में जागरूकता लाने का कार्य कर सकता है एवं अपने व्यवसाय के साथ न्याय कर सकता है।

श्रीडूंगरगढ़ कस्बा पिछले कई महीनों से चर्चा में है। शुरुआत हुई गत नगरपालिका चुनाव से जब भाजपा के बहुमत में आने के बावजूद भी भाजपा के ही एक उम्मीदवार ने नगरपालिका में भाजपा अध्यक्ष बनने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। लेकिन वर्तमान विधायक व तात्कालिक नेतृत्व के कुशल नेतृत्व के कारण जो अनहोनी हो सकती थी वो हुई नहीं। भाजपा ने एक आम कार्यकर्ता को श्रीडूंगरगढ़ कस्बे के प्रथम नागरिक के रूप में नगरपालिका अध्यक्ष बनाया। पूरे श्रीडूंगरगढ़ कस्बे ने इस कार्य की सराहना ही नहीं कि अपितु एक आम कार्यकर्ता का पार्टी द्वारा किये गए सम्मान को सराहा गया और श्रीडूंगरगढ़ कस्बे के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। फिर आयी राजस्थान की गहलोत सरकार की अतिमहत्वाकांक्षी योजना “पट्टा अभियान”। श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका फिर से जोरदार चर्चा में आई और ये चर्चा इतनी जोर से हुई कि क्षेत्र के हर आम-आवाम ही नही जिले के साथ साथ राजस्थान सरकार तक श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका का डंका बज गया। नगरपालिका ने अपनी ही जमीनों को खुर्द-बुर्द कर दिया। नगरपालिका में बैठे जनप्रतिनिधियों के मुंह में लालच का ऐसा चस्का लगा कि उन्होंने आमजन और कस्बे के हितों को ताक पर रख दिया। भूमाफियाओं के हाथों की कठपुतलियां बनकर क्षेत्र की करीब 600 बिग्गा जमीन को बेचकर खा गए। हालात ये है कि नगरपालिका ने जोहड़ पायतन और बीड़ भूमि को भी नहीं बख्शा। क्या जनप्रतिनिधि, क्या कार्मिक सभी के मुंह पर लालच रूपी खून लग गया और कस्बे की हजारों करोड़ रुपयों की जमीनों पर कब्ज़ा कर लिया गया और उनके पट्टे बना दिये गए। ये लोग यही नही रुके इन्होंने बने हुए राजशाही पट्टो पर भी पट्टे बना दिये। विडम्बना ये है कि अगर श्रीडूंगरगढ़ का कोई भामाशाह अगर श्रीडूंगरगढ़ की जरूरत का निर्माण यथा टाउनहॉल, रंगमंच का निर्माण करवाना चाहे तो उसके लिए भी नगरपालिका ने जमीन नही छोड़ी है।

हक़दार को हक़ नहीं

नगरपालिका के हालात ऐसे हो गए कि चीनी के लिए जैसे चींटियां झूम जाती है वैसे ही नगरपालिका के श्रीडूंगरगढ़ की जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि और भूमाफिया झूम गए। जो वास्तविक पट्टो के हक़दार थे जिनके लिए सरकार ने इस योजना को लागू किया वे लोग तो रह ही गए और जो जितना ज्यादा इन जनप्रतिनिधियों एवं कार्मिकों की जेब गर्म करता उसका पट्टा उतना ही जल्दी बनता चाहे वो वैधानिक हो या ना हो। रातों-रात खाली जगहों पर पट्टियां लगाई गई और उनके पट्टे बना दिये गए।

यहीं नही रुका भ्रष्टाचार

श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका में भ्रष्टाचार यहीं खत्म नहीं हुआ। ये तो सिर्फ शुरुआत थी। श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका के पास घर घर कचरा संग्रहण के 25 से ज्यादा टेम्पो थे और आज हालात ये है कि नगरपालिका के कार्मिकों को भी पता नही होगा कि उनके कबाड़ हो चुके टेम्पो कहाँ कहाँ खड़े है और आमजन के हालात ऐसे है कि घर पर कितना कचरा संग्रहण करे आखिर डालना तो सड़क पर ही पड़ेगा। जिससे सड़को पर कचरे के ढेर लग गए। सूत्रों के अनुसार नगरपालिका स्टोर से नगरपालिका में एक लाख तक का भुगतान सिर्फ कोटेशन और बिलिंग के आधार पर ही हो जाता है । और इन गत 3 सालों का अगर लेखा जोखा निकाला जाए तो छोटी राशि के इतने बिल पास हो गए जो करोड़ो में है।

अगर आमजन अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों को इसके लिये कहते है तो इनका सीधा सा जवाब होता है कि हम क्या करे…?

पालिका की साख पर बट्टा

श्रीडूंगरगढ़ के एक दुकानदार ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि अगर नगरपालिका हम लोगो से कोई सामान खरीदती है तो हम सामान होते हुए भी मना कर देते है क्योंकि वहां कोई धणी धोरी तो है नहीं। भुगतान समय पर किया नही जाता। अपने ही भुगतान के लिए महीनों चक्कर काटने पड़ते है। अधिकारी कोई मिलते नहीं। मिलते है तो जवाब नही देते। अब तो हालात ये है कि दुकानदारों ने सामान देने से ही मना कर दिया है।

आप गलत का विरोध नहीं कर सकते

श्रीडूंगरगढ़ इकलौती ऐसी जगह होगी जहां आप गलत का विरोध नही कर सकते। आप संविधान में दी गयी शक्ति का उपयोग नहीं कर सकते। कचरे और गंदगी के ढेर पर बसे कस्बे के लिये आवाज़ उठाने की जवाबदेही जहां विपक्ष की होती है वह विपक्ष भी ऐसा लगता है कि सत्ता के साथ मिलकर सत्ता की मलाई खाने में व्यस्त है। अगर गाहे बगाहे जनता अगर बोलना भी चाहे तो जनता का मुंह बन्द कर दिया जाता है।

ये सरासर लोकतंत्र की हत्या है…

लोकतंत्र में हर नागरिक को बोलने की स्वतंत्रता दी गयी है। संविधान में ये व्यवस्था दी गयी है कि गलत का विरोध आप कर सकते हो। लेकिन श्रीडूंगरगढ़ में अभी एक ताजा मामला ऐसा देखने को मिला है कि आमजन की आवाज को ही अपनी शक्ति के दबाव में दबाने की कोशिश की गई है। जहां पूरे हिंदुस्तान में कहीं भी कैसा भी प्रदर्शन किया जा सकता है जिसमे किसी भी प्रकार का सरकारी नुकसान ना हो। चाहे वो प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री सहित बड़े बड़े जनप्रतिनिधियों के ही पुतले जलाने हो या फिर किसी भी प्रकार का विरोध प्रदर्शन हो। लेकिन श्रीडूंगरगढ़ में ऐसा करना निषेध है। पक्ष और विपक्ष के जनप्रतिनिधियों की अकर्मण्यता से क्षुब्ध होकर जब सामान्यजन ने नगरपालिका अध्यक्ष का विरोध किया तो उस विरोध के विरुद्ध सत्ता की शक्ति से प्रभावित होकर उस विरोध को भी दबाने के लिए मुकद्दमा करवा दिया जाता है। आमजन की आवाज़ को उठाएगा कौन…? आज के जनप्रतिनिधियों ने तो मौन धारण कर रखा है। श्रीडूंगरगढ़ के पूर्व आंदोलनकारी विधायक भी इस मामले पर चुप ही रहे जबकि कुछ दिन पहले अपने स्वार्थ के लिये टंकी पर चढ़े व्यक्ति के समर्थन में अपनी आवाज बुलंद की।

अब सवाल ये है कि क्या जनता को आवाज़ उठाने का अधिकार नहीं है..?

क्या आम आदमी इन सत्ताधारियों के प्रभाव से हमेशा दबा हुआ ही रहेगा..?

क्या वे जनप्रतिनिधि वापिस जनता के सामने वोट मांगने के लिए नहीं जायेंगे…?

क्या ये सत्ता स्थायी रहने वाली है…?

जनता के सवाल विधायक से…

वर्तमान विधायक का व्यक्तित्व आमजन में सदाचार युक्त ईमानदार और व्यवहारिक व्यक्ति का है। आमजन की ये राय है कि ये पहले विधायक होंगे जो श्रीडूंगरगढ़ की वर्षों से लंबित पड़ी समस्याओं का निराकरण करवाएंगे। विधायक भी हर मंच पर इस ओर इशारा करते आये है कि वो जनता का काज करने आये है बिना किसी लोभ लालच के। विधानसभा चुनाव में वोट मांगते वक़्त कस्बे के हर मोहल्ले में श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका के कार्यकलापो के खिलाफ आवाज़ आमजन ने उठाई थी तो हर मंच से विधायक ने आमजन को ये वादा देकर आश्वस्त किया था कि विधायक बनते ही नगरपालिका की स्थिति को सुधारा जाएगा और आमजन को राहत दी जाएगी। लेकिन जनता अब ये सवाल पूछ रही है कि विधायक अपना वादा निभाये।

पूरा कस्बा विधायक की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहा है कि कचरे के ढेर पर बसे इस शहर को इस कचरे से निजात दिलाये और श्रीडूंगरगढ़ की इस भ्रष्ट नगरपालिका को सुधारें। नहीं तो चुनाव तो आगे भी आने वाले है और जनता हर हिसाब समय आने पर जरूर करती है।

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