राजस्थान में दो अहम समितियों की घोषणा के बाद बीजेपी में सियासी घमासान देखने को मिल सकता है। चर्चा है कि वसुंधरा राजे को मिले रहे झटके पर झटके के बाद उनके समर्थक एक्टिव मोड पर आ गए गए है। हालांकि, फिलहाल प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि आगामी दिनों में गुटबाजी सतह पर आ सकती है। वसुंधरा राजे अपने धुर विरोधी माने जाने नेताओं के सियासी पावर प्ले को भांप नहीं पाई है। जबकि उदयपुर में अमित शाह ने वसुंधरा राजे की वापसी के संकेत दिए थे। सियासी जानकारों का कहना है कि वसुंधरा राजे की अनदेखी करना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगी।
सियासी जानकार वसुंधरा राजे को साइडलाइन करने के अलग-अलग मायने निकाल रहे है। उनका कहना है कि संभवत: यहीं वजह है कि पहले सीएम फेस और अब अहम समतियों से वसुंधरा राजे को बाहर कर दिया गया है। वसुंधरा राजे ने देवदर्शन यात्रा के बहाने शक्ति प्रदर्शन कर अपनी ताकत का अहसास जरूर कराया लेकिन, विरोधी खेमा फिर भी भारी पड़ गया है। उल्लेखनीय है कि राजस्थान की राजनीति में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया वसुंधरा राजे के धुर विरोधी माने जाते हैं। तीनों ही नेताओं ने सबसे पहले कहा था कि चुनाव पीएम मोदी के चेहरे पर लड़ा जाएगा।
बीजेपी ने रणनीति में बदलाव किया..?
वसुंधरा राजे कई दिनों से दिल्ली दौरे पर थी। इस दौरान वसुंधरा राजे ने केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण से लेकर पीयूष गोयल समेत वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की थी। ऐसे माना जा रहा था कि वसुंधरा राजे को अहम जिम्मेदारी दी जाएगी। लेकिन जिस तरह से बीजेपी चुनाव समिति और मेनीफेस्टो कमेटी में जगह नहीं मिली है। उससे साफ जाहिर है कि वसुंधरा राजे के धुर विरोधी उन पर भारी पड़ गए है। हालांकि, प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह ने संकेत दिए है कि वसुंधरा राजे वरिष्ठ नेता है उन्हे पूरा सम्मान दिया जाएगा। वसुंधरा राजे के चुनाव कैंपेन समिति का चेयरमैन बनाया जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी ने चुनाव से पहले रणनीति में बदलाव किया है। इस बार शीर्ष नेतृत्व वसुंधरा या किसी और चेहरे के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव मैदान में उतरने का मन बना चुकी है। कई नेताओं ने इसके संकेत भर दिए हैं कि पार्टी इस बार बिना किसी चेहरे के उतरेगी।
क्या बीजेपी के लिए आसान होगा वसुंधरा को किनारे करना ..?
सियासी जानकारों का कहना है कि पार्टी के अंदर ही वसुंधरा राजे के ख़िलाफ़ एक बड़ी लॉबी बन गई है। हाल में अमित शाह के दौरे में इसकी झलक भी दिखी थी। उदयपुर में मंच पर अमित शाह के साथ वसुंधरा राजे भी थीं। नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने वसुंधरा की अनदेखी कर भाषण के लिए अमित शाह का नाम लिया था। हालांकि, अमित शाह ने वसुंधरा राजे की ओर इशारा कर भाषण के लिए कहा। लेकिन अब सवाल है कि क्या बीजेपी के लिए वसुंधरा राजे को साइडलाइन करना आसान होगा..? वसुंधरा राजे का एक अपना व्यक्तित्व है जो सियासत को किसी करवट बदलने का माद्दा रखता है। वसुंधरा राजे की नाराजगी बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती हैं।