The Khabar Xpress 26 सितम्बर 2026। श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका चुनाव 2026 ने शहर की राजनीति में एक ऐसा अध्याय जोड़ दिया है, जिसकी चर्चा लंबे समय तक होती रहेगी।
40 सदस्यीय नगरपालिका बोर्ड में भाजपा के पास केवल 13 पार्षद थे, जबकि कांग्रेस 15 पार्षदों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई। निर्दलीय पार्षदों एवं नवगठित विकास मंच की संख्या भी महत्वपूर्ण रही। यानी किसी भी दल के पास अपने दम पर बहुमत नहीं था। बहुमत का आंकड़ा दूर था।
ऐसे राजनीतिक समीकरणों के बीच भाजपा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पद हासिल करना महज संख्या का खेल नहीं था। यह राजनीतिक प्रबंधन, संवाद, रणनीतिक गणित और अंतिम समय तक समीकरण साधने की क्षमता की परीक्षा भी थी।
और यहीं श्रीडूंगरगढ़ विधायक ताराचंद सारस्वत की भूमिका सबसे अधिक चर्चा में आती है।
जब संख्या कम थी, तब रणनीति बड़ी थी
राजनीति में केवल सबसे ज्यादा सीटें जीतना ही सत्ता की गारंटी नहीं होता। श्रीडूंगरगढ़ का नगरपालिका चुनाव इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बन गया।
कांग्रेस 15 पार्षदों के साथ सबसे बड़ा दल थी, लेकिन अध्यक्ष पद उसके हाथ नहीं आया। भाजपा के नारायण प्रसाद ने 16 मत प्राप्त कर अध्यक्ष पद हासिल किया। इसके अगले दिन भाजपा के विनोद गिरी ने 17 मत लेकर उपाध्यक्ष पद भी अपने नाम कर लिया।
यानी भाजपा ने अपने 13 पार्षदों की संख्या को राजनीतिक समर्थन के जरिए प्रभावी बहुमत में बदलने का काम किया।
यही वह बिंदु है जहां विधायक ताराचंद सारस्वत की रणनीतिक क्षमता पर राजनीतिक चर्चा स्वाभाविक रूप से केंद्रित होती है।
स्थानीय स्तर पर दूरी की चर्चाओं के बीच संगठन को साधना
चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान भाजपा के भीतर स्थानीय स्तर पर सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच पूरी तरह एकजुटता नहीं होने की चर्चाएं भी सामने आती रही थीं। दूसरी ओर, भाजपा के पारंपरिक समर्थन आधार में सेंध लगाने के लिए विकास मंच भी मैदान में था।
नवगठित संगठन विकास मंच ने भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाई और उसके नौ पार्षद निर्वाचित हुए। इसके बावजूद अध्यक्ष पद पर भाजपा अपना उम्मीदवार जिताने में सफल रही।
ऐसे वातावरण में विधायक के सामने चुनौती सिर्फ कांग्रेस से मुकाबले की नहीं थी।
चुनौती थी—भाजपा के बिखरते समीकरणों को एक दिशा देना, समर्थक पार्षदों को एकजुट रखना और बोर्ड की सत्ता भाजपा के हाथ से निकलने से रोकना।
‘गढ़’ बचाने की कहानी
श्रीडूंगरगढ़ को भाजपा के मजबूत राजनीतिक आधार वाले क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। ऐसे में नगरपालिका चुनाव में भाजपा का 13 सीटों तक सिमट जाना निश्चित रूप से पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण परिणाम था।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
वार्डों की संख्या में पिछड़ने के बाद भी भाजपा ने अध्यक्ष पद अपने नाम किया और अगले ही चरण में उपाध्यक्ष पद भी जीत लिया।
इसलिए इस चुनाव को सिर्फ “कितनी सीटें मिलीं” के आंकड़े से देखना अधूरा होगा।
एक दूसरा सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है—
कम संख्या के बावजूद सत्ता का समीकरण किसने बनाया?
यहीं ताराचंद सारस्वत का नेतृत्व चर्चा के केंद्र में आता है।
विधायक के लिए यह चुनाव क्यों महत्वपूर्ण है?
विधानसभा चुनाव में जनता सीधे विधायक चुनती है, लेकिन नगरपालिका अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव पार्षदों के बीच राजनीतिक समीकरणों से तय होता है।
इसलिए नगरपालिका चुनाव विधायक के लिए अलग तरह की राजनीतिक परीक्षा होता है।
श्रीडूंगरगढ़ में इस परीक्षा का परिणाम यह रहा कि भाजपा अपने बहुमत से आठ सीट दूर होने के बावजूद अध्यक्ष पद तक पहुंची और उपाध्यक्ष पद पर भी जीत दर्ज की।
इसे विधायक ताराचंद सारस्वत के समर्थक उनके राजनीतिक प्रबंधन और रणनीतिक नेतृत्व की सफलता के रूप में देख सकते हैं।
विशेष रूप से इसलिए क्योंकि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अध्यक्ष चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को 16 और उपाध्यक्ष चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को 17 मत मिले।
यह जीत सिर्फ दो पदों की नहीं
इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक संदेश इससे कहीं बड़ा है।
भाजपा के लिए संदेश यह है कि वार्डों में संख्या कम होने के बावजूद संगठन राजनीतिक रूप से पूरी तरह अप्रभावी नहीं हुआ।
विधायक ताराचंद सारस्वत के लिए संदेश यह है कि नगरपालिका की सत्ता को भाजपा के हाथ में बनाए रखने के लिए उन्हें स्थानीय स्तर पर नए समीकरणों के साथ काम करना पड़ा।
और श्रीडूंगरगढ़ की राजनीति के लिए संदेश यह है कि आने वाले समय में सिर्फ पार्षदों की संख्या नहीं, बल्कि उनके बीच बनने वाले राजनीतिक समीकरण भी निर्णायक होंगे।
ताराचंद सारस्वत के नेतृत्व की असली परीक्षा अब
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में भाजपा की सफलता निश्चित रूप से विधायक ताराचंद सारस्वत के राजनीतिक नेतृत्व की चर्चा को मजबूत करती है।
लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी।
नगरपालिका बोर्ड में भाजपा के पास 13 पार्षद हैं। ऐसे में बोर्ड को स्थिर रखना, पार्षदों के बीच समन्वय बनाए रखना, विकास कार्यों को गति देना और जनता की अपेक्षाओं को पूरा करना आने वाले समय की बड़ी चुनौती होगी।
अगर यह राजनीतिक समीकरण विकास के काम में बदलता है, तो नगरपालिका चुनाव में हासिल की गई रणनीतिक सफलता को संगठनात्मक उपलब्धि के रूप में और मजबूती से देखा जाएगा।
तो दूसरी तरफ आने वाले पंचायत चुनावों मर श्रीडूंगरगढ़ की दो पंचायत समितियों श्रीडूंगरगढ़ एवं रिड़ी पंचायत समिति में भी भाजपा की जीत का परचम लहराना सबसे बड़ी चुनौती है।
श्रीडूंगरगढ़ नगरपालिका चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक सबक यही है—राजनीति में संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन संख्या से आगे बढ़कर समीकरण बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
13 पार्षदों वाली भाजपा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों पद जीतना एक ऐसा परिणाम है जिसने पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
स्थानीय स्तर पर दूरी और असहमति की चर्चाओं के बावजूद भाजपा को नगरपालिका की सत्ता तक पहुंचाना विधायक ताराचंद सारस्वत के नेतृत्व, राजनीतिक संवाद और रणनीतिक प्रबंधन की बड़ी परीक्षा थी।
वार्डों में संख्या कम हुई, लेकिन सत्ता का समीकरण भाजपा के पक्ष में रहा।
और श्रीडूंगरगढ़ की राजनीति में यही परिणाम अब एक नए सवाल को जन्म दे रहा है—
क्या ताराचंद सारस्वत ने सिर्फ नगरपालिका की सत्ता बचाई है, या भाजपा के राजनीतिक गढ़ को नए सिरे से मजबूत करने की नींव भी रख दी है ?