The Khabar Xpress 29 जुलाई 2026, श्रीडूंगरगढ़। श्रीडूंगरगढ़ में ट्रॉमा सेंटर का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सवाल पहले से ज्यादा तीखे हैं और जनता पहले से ज्यादा बेचैन। घोषणाएं हो चुकीं, आश्वासन दिए जा चुके, धरने हो चुके, ज्ञापन सौंपे जा चुके, लेकिन ट्रॉमा सेंटर आज भी कागज़ों से बाहर नहीं निकल पाया।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने गत वर्ष श्रीडूंगरगढ़ विधायक ताराचंद सारस्वत के गांव गुसाईसर के दौरे पर सरकार द्वारा ट्रॉमा सेंटर निर्माण की घोषणा की थी। गत कांग्रेस सरकार में भामाशाह द्वारा इस ट्रॉमा सेंटर निर्माण की घोषणा जोरशोर से हुई थी। पूर्व विधायक गिरधारी लाल माहिया ने विधानसभा चुनाव के नजदीक इसका शिलान्यास भी किया था, परन्तु सरकार बदलते ही पूर्व विधायक, दानदाताओं एवं वर्तमान सरकार के विधायक के बीच आरोप प्रत्यारोप के दौर शुरू हो गए और ये ट्रॉमा सेंटर निर्माण का मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। फिर सरकार ने स्वयं निर्माण कराने का निर्णय लिया।
लेकिन सवाल यह है कि जब जिम्मेदारी सरकार ने अपने हाथ में ले ली, तो फिर निर्माण शुरू क्यों नहीं हुआ ? आखिर देरी की वजह क्या है ? इसका जवाब जनता जानना चाहती है।
यह कोई छोटा-मोटा मुद्दा नहीं है। 655 दिनों से चल रहा धरना इस बात का प्रमाण है कि ट्रॉमा सेंटर की मांग किसी एक व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की जरूरत है। इसके बावजूद यदि व्यवस्था नहीं जागी, तो यह केवल प्रशासनिक सुस्ती नहीं, बल्कि जनभावनाओं की अनदेखी भी है।
अब यह मुद्दा फिर गर्म है। पूर्व में जो दानदाता इस ट्रॉमा सेंटर के निर्माण में आगे आये थे उन्ही के द्वारा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नाम लिखा पत्र वायरल हो रहा है जिसमे एक बार फिर ये ट्रॉमा निर्माण की स्वीकृति मांग रहे है। सोशल मीडिया पर लोग सवाल पूछ रहे हैं। विपक्षी राजनीतिक दल मैदान में उतर आए हैं। हर कोई ट्रॉमा सेंटर की बात कर रहा है।

लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह आवाज़ चुनाव तक ही सीमित रहेगी ? या चुनाव के बाद फिर फाइलों पर धूल जम जाएगी ?
पंचायत और निकाय चुनाव सिर पर हैं। ऐसे समय में विकास के अधूरे वादे सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनते हैं। ट्रॉमा सेंटर भी अब उन्हीं मुद्दों में शामिल हो चुका है। जनता अब भाषण नहीं, बुलडोज़र और निर्माण कार्य देखना चाहती है।
श्रीडूंगरगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। हर साल सड़क हादसों में घायल होने वाले लोगों को समय पर बेहतर उपचार नहीं मिल पाता। कई बार “गोल्डन ऑवर” सिर्फ इसलिए निकल जाता है क्योंकि ट्रॉमा जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में ट्रॉमा सेंटर किसी राजनीतिक उपलब्धि का प्रतीक नहीं, बल्कि लोगों के जीवन से जुड़ा बुनियादी अधिकार है।
राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा। विपक्ष केवल सवाल पूछकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता, और सत्ता पक्ष केवल घोषणा करके अपना कर्तव्य पूरा नहीं मान सकता। जनता दोनों से जवाब चाहती है।
अब समय आ गया है कि ट्रॉमा सेंटर को चुनावी मंचों की तालियों से निकालकर निर्माण स्थल तक पहुंचाया जाए। यदि सरकार गंभीर है, तो निर्माण की स्पष्ट समय-सीमा घोषित करे। यदि कोई बाधा है, तो उसे सार्वजनिक करे। लेकिन अब खामोशी स्वीकार नहीं की जाएगी।
655 दिनों का धरना, वर्षों के इंतजार और अनगिनत आश्वासनों के बाद श्रीडूंगरगढ़ की जनता सिर्फ एक सवाल पूछ रही है—ट्रॉमा सेंटर आखिर कब बनेगा ?
क्योंकि अब यह सिर्फ ट्रॉमा सेंटर का मुद्दा नहीं, बल्कि सरकार की घोषणा, प्रशासन की कार्यशैली और जनविश्वास की परीक्षा बन चुका है।









