The Khabar Xpress 10 जुलाई 2025। जीवन में धार्मिक-आध्यात्मिक यात्रा का प्रथम कदम गुरु महिमा से ही प्रारम्भ होता है। गुरु के प्रति असीम श्रद्धा और उनके वचनों में विश्वास होने से, शिष्य के सारे भौतिक-अभौतिक कार्य स्वतः बनते चले जाते हैं। गुरु का कार्य दोहरा है- प्रथमतः वे शिष्य के समूचे कल्याण की जिम्मेदारी ओटते हैं, इसलिए निर्विघ्न प्रभु मार्ग पर आगे बढ़ने की युक्ति पूर्वक प्रेरणा देते हैं और दूसरी ओर जागतिक कार्यों में उसे सद्मार्गी और प्रामाणिक बनाते हैं। इस प्रकार गुरु दोनों ओर से सहेजते हैं। गुरु शरण होने के बाद शिष्य का पतन नामुमकिन-सा ही है। अगर ऐसा होता है तो या तो गुरु ने सम्भाला ही नहीं या फिर शिष्य ही शरण नहीं हुआ। जिस दिन, शिष्य गुरु चरणों में पहुंचा, गुरु की कृपा दृष्टि उस पर पड़ी, समझो आधा कल्याण तो उसी दिन हो गया। गुरु अपने प्राणों से अधिक अपने शिष्य से प्रेम करते हैं। गुरु के मन में यह सात्विक चाव रहता है कि वे जो कुछ जानते हैं- उसे शीघ्र अपने शिष्य में भर दें। वे चाहते हैं- मेरा शिष्य थोड़े ही दिनों में मुझसे आगे निकल जाए। वह आध्यात्मिक जगत की समस्त ऊँचाइयों को प्राप्त कर ले। कल वह भी गुरु पद को धारण कर अपने शिष्यों को यह ज्ञान सम्पदा आगे बांटे- शिष्य के प्रति गुरु के मन में सदैव यही उदात्त भाव रहते हैं।
मनुष्य जीवन को घटनाओं का समुच्चय कहा गया है। इसमें नाना घटनाएं घटित होती रहती हैं, उन सभी घटनाओं में प्रमुख घटना है- सद् गुरु से भेंट हो जाना, गुरु का मिल जाना। हर किसी को गुरु की प्राप्ति सम्भव नहीं है, ऐसे सौभाग्य किसी-किसी के ही होते हैं। किसी भी चीज की प्राप्ति तभी होती है जब उसके प्रति मन में गहरी चाह उपजे। गुरु प्राप्ति की मन में चाह ही नहीं है तो गुरु कैसे मिलेंगे? प्रथमतः मन में यह विचार उपजना जरूरी है कि-मेरा कल्याण कैसे होगा? मुझे कल्याण के मार्ग पर कौन ले जाएगा? स्व कल्याण और कल्याण का मार्ग बताने वाले का मिलना – ये दो उत्कट इच्छाएं मन में पैदा हो गई तो दोनों को पूरा करना भगवान का कार्य है। वे कल्याण मार्ग के लिए अवश्य ही सद्गुरु से भेंट कराएंगे, बाकी का कार्य उन गुरुजी का। आप तो चाह करो गुरु प्राप्ति की। सच्ची चाह, हृदय से उमड़ कर पैदा हुई चाह, गुरु प्राप्ति से पहले मुझे और कुछ नहीं चाहिए। ऐसा सतत् चिंतन बन जाए।
ऐसी सात्विक चाह रखने वालों को उतने ही उच्च कोटि के सद्गुरु मिले हैं-ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने रहे हैं। गुरु की खोज का मूल कारण तो ईश्वर प्राप्ति की जिज्ञासा ही है। अव्यक्त सत्ता को जानने और पाने की अभिलाषा में व्यक्ति स्वयं को कहीं न कहीं कई मायनों में अक्षम पाता है, इसलिए उसे कोई इस सम्बन्ध में ठीक-ठीक ज्ञान करावे। भीतर जो अतृप्ति जन्मी है, उसे कोई तृप्त कर दे। ऐसा सोच- ऐसा भाव गुरु के द्वारे तक ले जाता है। ईश्वर- जिज्ञासा से प्रेरित होकर विवेकानन्द (नरेन्द्र) रामकृष्ण परमहंस के पास पहुंचे और जाते ही पहला सवाल यही किया कि ‘क्या आपने ईश्वर को देखा है?’ शिष्यों की यही जिज्ञासा हुआ करती है। इसी प्रश्न के उत्तर से ही तो वे आश्वस्त होना चाहते हैं। भले ही बाद में शिष्य का अपने गुरु के प्रति दृढ़ विश्वास और विकट श्रद्धा जम जाए, पर पहले तो वह परखने का ही काम करेगा। इसलिए परखेगा, क्योंकि उसका उद्देश्य महत्त है-वह परमात्मा की खोज में आया है-उसे ऐसा गुरु चाहिए जो सहज ही, हाथ पकड़कर उस परिणति तक ले जाए। अब ऐसे-वैसे गुरु से काम नहीं चलना है। इतना तो शिष्य भी जनता है कि उसे जो मुक्ति नाम की चीज चाहिए वह सहज रूप से गुरु ही बता सकते हैं। मेरा गुरु परमात्म प्राप्ति में मेरे बड़े सहयोगी हो जाएं, उसकी – सारी, अब तक की जमा तमाम जिज्ञासाओं को शान्त कर दे-वह हो जाए-निर्द्वन्द्व। उसे ऐसे गुरु की दरकार है। शिष्य ने अब तक अपने बुद्धि- बल-कौशल, अध्ययन, प्रयत्न से परमात्मा को जानने की क्या कम कोशिशें की हैं? अपने प्रयत्नों-उद्यमों से उसका काम चला नहीं, बना नहीं, तभी तो जागी यह अनुकामना कि अब चला जाए एक वास्तविक अन्वेषी के पास, जिसने प्रभु को पूरा-पूरा खोज लिया है। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को हृदय से लगाकर आश्वस्त किया-‘हां रे उस ईश्वर को मैं ठीक वैसे ही देखता हूं-जैसे इस वक्त तुम्हें’ और क्या चाहिए था विवेकानन्द को-इसी गुरु की तो प्रतीक्षा थी। जिस परमात्मा को वह देखना चाहता है- उसे हस्तामलक की भांति दिखा दे। परमोच्च सत्ता और उसके बीच के आवरण को किसी पर्दे की भांति खींच कर अलग कर दे।
गुरु प्राप्ति की जितनी उत्कट अभिलाषा शिष्य के हृदय में होती है, वैसी ही चाह गुरु के मन में भी योग्य शिष्य प्राप्ति के लिए रहती हैं। शिष्य प्राप्ति के साथ ही गुरु को यह प्रतीत होता है, जैसे बोझ मुक्त हो गए हैं। योग्य वारिस, चिंता मुक्त तो करता ही है, भले ही पास में पूंजी ज्ञान की ही क्यों न हो। विवेकानन्द के शिष्यत्व ग्रहण करने के केवल पांच वर्ष बाद रामकृष्ण परमहंस ने समाधि ग्रहण करते समय कहा-‘मैंने अपना सर्वस्व तुम्हें दे दिया है, तूं इस शक्ति से जगत् के कल्याण कार्य करना।’
यह गुरु की आखरी आज्ञा होती है। इसी आज्ञा के लिए गुरु के प्राण अटके हुए होते हैं। योग्य शिष्य मिला कि वे उऋण हुये-तो मैंने मेरे पास जो कुछ था तुम्हे सौंप दिया। अब मैं कृत- कार्य हुआ-मेरी यात्रा यहीं तक की थी। अब ‘मैं’ तुम में उतर गया हूं। गुरु शिष्य का रूपान्तरण करते हैं। गुरु से मिलने के बाद निश्चय ही शिष्य पहले जैसा नहीं रहता-उसका आभ्यंतर बदल चुका होता है। गुरुजी आपके भीतर जड़ जमाये हुए अवसाद, कुंठाएं, मिथ्या सोच को, सम्यक् रूप से कहें तो, थोथे विकारों को निकाल बाहर करते हैं। गुरु के वाक्य भीतर ही भीतर कुछ रिपेयर जैसा करते हैं और बाहर कुछ निखार जैसा देते हैं-वे बेवजह हंसना सिखाते हैं- जब तुम गूंगे व्यक्ति की भांति वजह बेवजह हंसने लगते हो तो गुरुजी को आश्वस्ति होने लगती है- हां कलुषा जा रही है। प्रेम का बिरवा लहलहाने लगा है। भीतरी अमृत कुंड सजग होने लगा है। सुप्त पड़ी आंच सुलगने लगी है। लावण्य में ओज भर गया है। शब्द मर्म पाने लगे हैं। चीजें दूसरे ढंग से दिखने लगी हैं। दृष्टि उर्ध्वमुखी होने लगी है। चीजों के प्रति लापरवाही और उदासी प्रकट होने लगी है। भीतरी सुगन्ध के प्रति छटपटाहट और बढ गई है। गुरु भांप लेते हैं इन दशाओं को, उन्हें आप में यही तो चाहिए था। तुम भी तो इसलिए तो आए थे गुरु चरण रज को ग्रहण करने-अब वह असर दिखा रही है। भीतर की कस्तुरी सुवासित होने लगी है। अब तुम इसकी महक में रहोगे।
यह परिवर्तन इसलिए हुआ क्योंकि गुरु कृपा से पहले की दशा का निवारण हो गया। अब तुम पहले वाले हो ही नहीं। अब तुम्हारा सोच, विचार, क्रियाएं, आचरण कुछ भी तो पहले जैसा नहीं रहा। सब में एक सुधड़ता, तरतीब दिखाई देने लगी है। अब तुम्हारी दीनता कहीं भाग गई है। आत्म विश्वास ऐसा आया है, जैसे कोई परम धन मिल गया हो। सत्गुरु की कृपा मेघ की भांति सब शिष्यों पर एकसी बरसती है। पर, पूरम् पूरे भीगने वाले शिष्य थोड़े होते है। जो भीग गए- सो तर गए।
यहां इस उल्लेखनीय तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा कि जो जाति समुदाय, मुक्ति की राह बताने वाले ‘गुरु’ से वंचित हैं-वे समुदाय निरंतर पतन के शिकार होते चले जाते हैं। उनमें आचरण शैथिल्य, और अज्ञानाधंकार तेजी से प्रसार पाने लगता है- वे नाना प्रकार के भ्रम के शिकार होने लगते हैं। अध्यात्म और धर्म के संस्कार तिरोहित होने लगते हैं। वस्तुतः गुरु पथ से च्युत होने से बचाते हैं, पर जिनके पास गुरु नहीं हैं, वे स्वच्छंद हैं- उन्हें पथ-कुपथ का सच्चा ज्ञान कराने वाला कोई नहीं होता। वे जो सोचते हैं केवल तुच्छ बुद्धि से ही सोचते हैं। उन्हें लोभ लाभ की कारा से कौन निकाले? विकारों के दल-दल से, विषमताओं के जंगल से कौन बाहर निकाले ! वर्तमान युग तो बड़ा ही निराला है- हर आदमी अपने प्रति निश्शंक हो चला है, उसे स्वयं के डूबने की तनिक भी चिंता नहीं है, वह अपने प्रति एकदम आश्वस्त है। अपने आधे-अधूरे भौतिक ज्ञान से ही अपने को विद्वान समझता है। आध्यात्मिक चिंतन को वह चिंतन की कोटि में ही नहीं रखना चाहता। लेकिन सोचा जाए, आत्मिक विनाश से ऊपर कौनसा विनाश है ? आत्म-ज्ञान गुरु प्रदान करते हैं-वे ही समझाते हैं कि तुम शरीर नहीं हो-तुम शुद्ध-बुद्ध परमात्म तत्त्व हो। ऐसे दया के आगार, निराधार के आधार, ज्ञान के पारावार। हाथ का सहारा देकर तारने वाले गुरु को कब तक भूले हुए रहेंगे?
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डॉ चेतन स्वामी, साहित्य एवं इतिहासकार










